BREAST CANCER AWARENESS MONTH • OCTOBER 2026

Breast Cancer Screening: समय पर जाँच, जीवन की सुरक्षा
By Dr. Poonam Agarwal | Om Hospital & Research Centre, Firozabad
“स्तन कैंसर का जल्दी पता चलना, सफल इलाज की संभावना को बढ़ा सकता है।”
स्तन कैंसर (Breast Cancer) महिलाओं में होने वाले सबसे आम कैंसरों में से एक है। भारत में भी इसके मामले लगातार चिंता का विषय बने हुए हैं। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती अवस्था में स्तन कैंसर के कोई स्पष्ट लक्षण नहीं भी हो सकते हैं।
Age related Guidance
20 –39 वर्ष -
Breast awareness रखें; कोई बदलाव होने पर चिकित्सकीय जाँच
40–44 वर्ष-
व्यक्तिगत जोखिम के अनुसार mammography पर चर्चा
45–54 वर्ष -
कई दिशानिर्देशों के अनुसार नियमित mammography महत्वपूर्ण
55 वर्ष से अधिक-
स्वास्थ्य, जोखिम और दिशानिर्देशों के अनुसार हर 1–2 वर्ष में mammography
उच्च जोखिम वाली महिलाएँ -
कम उम्र से विशेष स्क्रीनिंग, कभी-कभी MRI सहित
अमेरिकन कैंसर सोसायटी के अनुसार औसत जोखिम वाली महिलाओं को 45–54 वर्ष में प्रतिवर्ष mammography करवाने की सलाह दी जाती है। वहीं USPSTF 40–74 वर्ष की महिलाओं के लिए हर दो वर्ष में mammography की सिफारिश करता है।
भारत में स्क्रीनिंग कार्यक्रमों में 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के लिए Clinical Breast Examination का भी उपयोग किया जाता है। इसलिए जाँच का चुनाव व्यक्तिगत जोखिम और उपलब्ध सुविधाओं के आधार पर होना चाहिए।
इन लक्षणों को कभी नजरअंदाज न करें:
स्तन या बगल में नई गाँठ महसूस होना।
स्तन के आकार या बनावट में अचानक बदलाव।
त्वचा पर गड्ढे पड़ना या संतरे के छिलके जैसी त्वचा दिखाई देना।
निप्पल का अचानक अंदर की ओर मुड़ना।
निप्पल से खून जैसा स्राव होना।
स्तन की त्वचा पर लगातार लालिमा, मोटापन या घाव।
स्तन में एक स्थान पर लगातार बना रहने वाला दर्द।
महत्वपूर्ण: हर गाँठ कैंसर नहीं होती, लेकिन हर नई या संदिग्ध गाँठ की उचित जाँच आवश्यक है। दर्द न होना भी कैंसर न क्या बिना किसी लक्षण के भी स्क्रीनिंग जरूरी है?
हाँ। यही स्क्रीनिंग का मुख्य उद्देश्य है।
स्तन कैंसर शुरुआती अवस्था में अक्सर दर्द रहित होता है। नियमित स्क्रीनिंग से कुछ कैंसर छोटे आकार में और शरीर के अन्य भागों में फैलने से पहले पहचाने जा सकते हैं।
इससे कम व्यापक उपचार की संभावना बढ़ सकती है और स्तन कैंसर से मृत्यु का जोखिम कम हो सकता है।
हालाँकि स्क्रीनिंग की कुछ सीमाएँ भी हैं, जैसे false-positive रिपोर्ट, अतिरिक्त जाँच की आवश्यकता और overdiagnosis। इसलिए सही उम्र और जोखिम के अनुसार स्क्रीनिंग महत्वपूर्ण है।

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